छठ पूजा 2026: तारीख, विधि और महत्व

Deva AI टीम द्वारा · · 6 मिनट में पढ़ें

सुबह की सुनहरी रोशनी में नदी के घाट पर पानी में खड़े तीन श्रद्धालु बांस के सूप में फल, गन्ना, ठेकुआ और दीया लेकर उगते सूरज को अर्घ्य देने जा रहे हैं।

संक्षिप्त उत्तर

छठ पूजा 2026 में ज़्यादातर पंचांगों के अनुसार 13 नवंबर (नहाय-खाय) से 16 नवंबर (उषा अर्घ्य) तक चार दिन चलेगी, और संध्या अर्घ्य रविवार, 15 नवंबर को है। यह सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का पर्व है, जिसमें व्रती लगभग 36 घंटे निर्जला उपवास रखकर डूबते और उगते सूरज को अर्घ्य देते हैं। सटीक समय शहर के सूर्यास्त-सूर्योदय पर निर्भर है, इसलिए अपने शहर का पंचांग ज़रूर देखें।

चार दिन, घाट पर बांस के सूप, ठेकुए की खुशबू और छठी मैया के गीत — छठ का नाम सुनते ही यही सब याद आता है। लेकिन हर साल तारीख और क्रम फिर से पूछना पड़ता है। छठ पूजा 2026 कब है? ज़्यादातर पंचांगों के अनुसार यह पर्व 13 नवंबर से 16 नवंबर 2026 तक चलेगा, और मुख्य दिन, यानी संध्या अर्घ्य, रविवार 15 नवंबर को है। नीचे चारों दिन का क्रम, पूजा की विधि, व्रत के नियम और इस पर्व का असली मतलब सरल भाषा में दिया है।

छठ पूजा 2026 की तारीखें क्या हैं?

छठ दिवाली के छह दिन बाद, कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को पड़ता है। 2026 में दिवाली 8 नवंबर को है, इसलिए छठ का मुख्य दिन उससे एक हफ़्ते बाद आता है।

दिन तारीख (2026) क्या होता है
पहला दिन: नहाय-खाय शुक्रवार, 13 नवंबर स्नान, घर की सफ़ाई और सादा सात्विक भोजन से व्रत की शुरुआत।
दूसरा दिन: खरना शनिवार, 14 नवंबर दिन भर निर्जल उपवास, शाम को गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद। इसी के बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है।
तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य रविवार, 15 नवंबर शाम को घाट पर डूबते सूरज को अर्घ्य।
चौथा दिन: उषा अर्घ्य सोमवार, 16 नवंबर सुबह उगते सूरज को अर्घ्य देकर व्रत का पारण।

ध्यान रखें कि कुछ पंचांगों और कैलेंडरों में तिथि एक दिन आगे-पीछे दिखाई देती है, क्योंकि षष्ठी तिथि का समय शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त के हिसाब से बदलता है। अर्घ्य का सटीक समय आपके शहर के सूर्यास्त और सूर्योदय के समय पर निर्भर है, इसलिए घाट जाने का समय तय करने से पहले अपने शहर का पंचांग ज़रूर देख लें।

छठ पूजा किसकी पूजा है और इसका क्या महत्व है?

छठ सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का पर्व है। सूर्य को सारे जीवन की ऊर्जा का स्रोत माना जाता है, और छठी मैया को संतान की रक्षा और परिवार की सुख-समृद्धि की देवी के रूप में पूजा जाता है। इसकी कुछ खास बातें:

  • प्रकृति की पूजा। इसमें मूर्ति की जगह सीधे सूर्य, जल और प्रकृति की उपासना होती है। प्रसाद भी मौसमी फल, गन्ना और घर में बना ठेकुआ जैसी सादी चीज़ें हैं।
  • दोनों समय का अर्घ्य। यह उन गिने-चुने पर्वों में है जिनमें डूबते सूरज को भी उतने ही आदर से अर्घ्य दिया जाता है जितना उगते सूरज को।
  • पंडित की ज़रूरत नहीं। व्रती और परिवार खुद सब कुछ करते हैं, इसलिए यह पर्व बहुत अपना-सा लगता है।
  • कठिन व्रत, गहरी श्रद्धा। लगभग 36 घंटे का निर्जला उपवास अनुशासन और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

इस पर्व की जड़ें कई कथाओं से जोड़ी जाती हैं। मान्यता है कि महाभारत में कर्ण रोज़ जल में खड़े होकर सूर्य की उपासना करते थे, और द्रौपदी ने पांडवों के कठिन समय में सूर्य की पूजा की थी। रामायण की परंपरा में सीता जी द्वारा सूर्य की उपासना का ज़िक्र भी लोक में सुनाया जाता है। इन कथाओं के अलग-अलग रूप हैं, और कौन-सी आपके परिवार की मान्यता है, यह घर की परंपरा तय करती है। छठ मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई इलाके में मनाया जाता है, पर अब देश-विदेश में जहां भी पूर्वांचल के लोग हैं, वहां घाट सज जाते हैं।

छठ पूजा की विधि चार दिन में कैसे होती है?

परंपरा थोड़ी-बहुत अलग-अलग घरों में बदलती है, पर आम क्रम यह है:

  1. नहाय-खाय (13 नवंबर): सुबह नदी, तालाब या घर पर स्नान, पूरे घर और रसोई की सफ़ाई। फिर शुद्धता से बना सादा भोजन, आमतौर पर कद्दू की सब्ज़ी, चने की दाल और भात। व्रती पहले खाते हैं और फिर परिवार।
  2. खरना (14 नवंबर): दिन भर बिना पानी का उपवास। शाम को मिट्टी के चूल्हे पर गुड़ की खीर और रोटी बनाकर छठी मैया को भोग लगाया जाता है, फिर व्रती उसे ग्रहण करते हैं और परिवार में प्रसाद बांटा जाता है। इसके बाद अगले सूर्योदय तक पानी भी नहीं पिया जाता।
  3. संध्या अर्घ्य (15 नवंबर): दिन में ठेकुआ और बाकी प्रसाद तैयार होता है। शाम को परिवार बांस के सूप में फल, गन्ना, ठेकुआ और दीया सजाकर घाट जाता है। व्रती पानी में खड़े होकर डूबते सूरज को अर्घ्य देते हैं, और रात में कई घरों में छठी मैया के गीत गाए जाते हैं।
  4. उषा अर्घ्य (16 नवंबर): तड़के फिर घाट पर पहुंचकर उगते सूरज को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद प्रसाद बांटा जाता है और व्रती पारण करके व्रत खोलते हैं।

छठ पूजा में कौन-सी सामग्री लगती है?

  • बांस का सूप और टोकरी (डलिया)
  • ठेकुआ (गेहूं के आटे और गुड़ का पारंपरिक प्रसाद)
  • मौसमी फल: केला, नारियल, सेब, सिंघाड़ा आदि
  • गन्ने के डंठल, जो अक्सर घाट पर सजावट और अर्घ्य दोनों में काम आते हैं
  • मिट्टी के दीये, फूल, चावल और जल के लिए लोटा या कलश
  • खरना के लिए गुड़, चावल और आटा

सामग्री की ठीक-ठीक सूची इलाके और परिवार की परंपरा के हिसाब से थोड़ी बदल सकती है। जो बड़े-बुज़ुर्ग से सीखा हो, वही सबसे भरोसेमंद है।

छठ के व्रत में किन नियमों का ध्यान रखें?

  • शुद्धता सबसे ऊपर। प्रसाद बनाने से पहले स्नान, साफ़ कपड़े, और रसोई में सात्विक भोजन के नियम का पालन किया जाता है।
  • व्रत के बाद प्रसाद ही ग्रहण करें। खरना के बाद 36 घंटे निर्जला व्रत चलता है, जो हर किसी के स्वास्थ्य के लिए सही नहीं होता। जिन्हें स्वास्थ्य की कोई समस्या हो, वे डॉक्टर और घर के बड़ों से सलाह लेकर ही व्रत रखें।
  • सब मिलकर साथ दें। पूरा परिवार मिलकर सूप सजाने, ठेकुआ बनाने और घाट तक जाने में हाथ बंटाता है। यही छठ को सबसे ज़्यादा सामुदायिक पर्वों में से एक बनाता है।

अगर घाट पर न पहुंच सकें, या घर से दूर हों तो?

बहुत से लोग नौकरी या पढ़ाई की वजह से इस बार छठ पर घर नहीं पहुंच पाते। कई परिवार ऐसे में घर की छत या आंगन में पानी भरकर अर्घ्य देते हैं, और घर पर रहकर ही उतनी ही श्रद्धा से पर्व मनाते हैं।

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छठ के एक हफ़्ते पहले दिवाली भी है; उसकी पूजा की तैयारी के लिए दिवाली 2026 पर घर पर लक्ष्मी पूजा की विधि पढ़ें।

निष्कर्ष

छठ पूजा 2026 में 13 से 16 नवंबर तक है: नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य (रविवार, 15 नवंबर) और उषा अर्घ्य। यह पर्व सादगी, अनुशासन और प्रकृति के प्रति आभार का पर्व है, जिसमें डूबते और उगते, दोनों सूरज को बराबर आदर मिलता है। तारीख और अर्घ्य का समय अपने शहर के पंचांग से मिला लें, और बाकी परंपरा अपने घर के बड़ों से सीखें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

छठ पूजा 2026 में कब है?

ज़्यादातर पंचांगों के अनुसार छठ पूजा 13 नवंबर 2026 (नहाय-खाय) से 16 नवंबर (उषा अर्घ्य) तक चलेगी, और मुख्य संध्या अर्घ्य रविवार, 15 नवंबर को है। कुछ पंचांगों में तिथि एक दिन आगे-पीछे दिखती है, इसलिए अपने शहर का पंचांग देख लें।

छठ पूजा किसकी पूजा है?

छठ पूजा सूर्य देव और छठी मैया की उपासना है। सूर्य को जीवन और ऊर्जा देने वाला माना जाता है, और छठी मैया को संतान की रक्षा और परिवार की सुख-समृद्धि की देवी के रूप में पूजा जाता है।

नहाय-खाय और खरना क्या होता है?

नहाय-खाय पहले दिन होता है: नदी या तालाब में स्नान करके घर की सफ़ाई के बाद सादा, सात्विक भोजन (आमतौर पर कद्दू-भात) खाया जाता है। खरना दूसरे दिन है: दिन भर निर्जल उपवास के बाद शाम को गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद बनाकर खाया जाता है, और इसके बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है।

छठ पूजा में क्या-क्या सामग्री लगती है?

बांस का सूप और टोकरी, ठेकुआ, मौसमी फल (केला, नारियल, सेब, सिंघाड़ा आदि), गन्ना, दीया, फूल, चावल और नारियल प्रमुख हैं। बाकी सामग्री इलाके की परंपरा के अनुसार थोड़ी बदल सकती है।

क्या छठ पूजा में पंडित की ज़रूरत होती है?

आम तौर पर नहीं। छठ में व्रती और परिवार खुद ही सब कुछ करते हैं, जैसे प्रसाद बनाना, घाट पर जाना और अर्घ्य देना। यही इस पर्व की सादगी और अपनापन है।

अगर घाट पर न जा सकें तो क्या करें?

कई परिवार घर की छत, आंगन या किसी बड़े बर्तन-टब में पानी भरकर अर्घ्य देते हैं। भाव और नियम का पालन असल बात है; जगह इससे कम मायने रखती है।

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